AUR KITNE DURYODHAN (Hindi)A Poem by hardeep sabharwal
"र कितने दूर्योधन
हस्तिनापुर में तो केव™ एक धृतराष्टृ था, "र आज के आधुनिक भारत में अन-िनत धृतराष्टृ अपनी अपनी महत्वाकांक्षायों अपने अपने धर्मो "र जातियों की हस्तिनापुर बनाते बनाते कि™े अराष्टृियता के यहां राष्टृ से अधिक परिवार-वाद महत्वपूर्ण है निजी स्वार्थो से घिरे अनीति को नीती बनाते पाप को पुन्य मे परिभाषित करते कुतर्को से सींचते अपने अपने दूर्योधनो की अनैतिक कामनायों को ये आंखो वा™े धृतराष्टृ हस्तिनापुर में तब श्रीकृष्ण आऐ थे सारथी बन कर धर्मक्षेत्र के पर इस बार शायद ये देखकर मुस्कुरा रहे हो कहीं या फिर इन्तजार कर रहे हो कि कब ज™े-ी वो अ™ख जो श्रीकृष्ण ने ज™ाई थी कभी अर्जुन में भारत के हर मानव में राष्टृ के ™िए . © 2016 hardeep sabharwalFeatured Review
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2 Reviews Added on March 8, 2016 Last Updated on March 8, 2016 Authorhardeep sabharwalpatiala , punjab , IndiaAboutHardeep Sabharwal describes himself as person of few words. He is one of millions of middle class Indians who do not have any ideology; they only want to live a peaceful life. The thing that hurts him.. more.. |

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